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1987: मेरठ दंगा जिसने अयोध्या विवाद के नीव को रखा

भारत देश की आजादी से पहले ही इस देश में दंगे होते रहे है. फिर चाहे वह 1921: मोपला नरसंहार हो या फिर 1946 में हुआ नओखलि दंगा हो या फिर देश के आजाद होते ही हुआ दंगा हो. उसके बाद देश के अलग अलग राज्यों में चाहे जो भी राजनैतिक पार्टी की
सरकार रही हो, सभी के सरकार में रहते हुए दंगे हुए ही है. कभी जी न्यूज़ का हिस्सा रहे और फिलहाल आज तक में कार्यरत पत्रकार ने एक बार कहा था कि, "चाहे कोई भी पार्टी हो, खून के धब्बे हर एक पार्टी के दामन पर है." ऐसा ही एक दंगा था 1987 में हुआ मेरठ का दंगा. मेरठ में दंगो का लम्बा इतिहास रहा है. मेरठ में 1961, 1968, 1973, 1982 में दंगे हुए है, जो कभी दो व्यक्ति के झगडे से दो समुदायों के बीच का झगड़ा बन गया, तो कभी म्युनिसिपल जमीन को लेकर हुए झगड़ो ने दंगे का रूप ले लिया. परंतु 1987 का दंगा इस वजह से खास था, क्योंकि यही से अयोध्या राम मंदिर विवाद की नीव पड़ी.

पृष्टभूमि
अयोध्या के राम मंदिर का विवाद बहुत पुराना है. इसी बढ़ते विवाद को देखते हुए, 1949 में इस मंदिर (उस समय बाबरी मस्जिद) के परिसर को आम जनता के लिए बंद कर दिया. इस तरह से यह मंदिर अपने छोटे से दायरे में सभी विवादों को लेकर सिमट गया. परंतु फरवरी 1986 में किसी ने स्थानिक अदालत में यह मंदिर परिसर आम हिन्दुओं के लिए खोलने की याचिका की. अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए हिन्दुओं के लिए भी उस मंदिर के दरवाजो को खोलने का हुक्म दे दिया. यही से साम्प्रदायिकता की आग धीरे धीरे फैलना शुरू हो गया. इस हवा देने में तथाकथित सेक्युलर और कुछ बुद्धिजीवी शामिल थे. राम मंदिर के दरवाजों को आम हिन्दुओं के लिए खोलने पर पुरे देश में इसका विरोध हुआ. धीरे धीरे सभी ने इस आग में घी डालने का काम किया. 
सैयद सहाबुद्दीन ने इसी राम मंदिर विवाद को देखते हुए मार्च 1987 को दिल्ली में रैली का आयोजन किया. वहाँ हजारो मुसलमान युवा इस रैली में भाग लेने पहुँचे. इनके वापस आने पर मेरठ में इनके समुदाय के लोगों ने इनका भव्य स्वागत किया गया. परंतु हिन्दुओं की भौ इन मुसलमानों पर तन गई. मुसलमानों ने जहाँ राम मंदिर का दरवाजा खुलने के विरोध में हर काले झंडे का जवाब  विश्व हिन्दू परिषद् ने भगवा झंडों से दिया. नुक्कड़ सभाएँ, भड़काऊ भाषण यहाँ आम बात हो गई. राज्य के खुफिया विभाग ने चेतावनी भी दिया कि इस तरह कि गतिविधियाँ कभी भी सांप्रदायिक दंगे का रूप ले सकती है. मुसलमानों में अयोध्या मंदिर के मामले को लेकर उग्र भावना है. वो किसी भी हद तक जाने को तैयार है. हिन्दू भी उन से किसी मायने में काम नहीं दिख रहे.

अयोध्या मुद्दे का राष्ट्रीय राजनीति करण
अयोध्या का मुद्दा स्थानिक हदें तभी पार कर गया था, जब सैयद शाहबुद्दीन ने मुसलमानों से गणतंत्र दिवस पर होने वाले समारोह का विरोध करने को कहा और अयोध्या के लिया लॉन्ग मार्च के लिए तैयार रहने को कहा. 1987 का वर्ष शुरुआत से ही ऐसी राजनैतिक बयानों से गरम था. शाहबुद्दीन के गणतंत्र दिवस के परेड का विरोध करने की बात पर विवाद तो होना ही था. बात ही ऐसी थी. उस समय केंद्र और राज्य दोनों ही जगह कांग्रेस की सरकार थी. पर शाहबुद्दीन की इस बात को किसी भी कांग्रेस विरोधी सेक्युलर पार्टी का कुछ खास समर्थन प्राप्त नहीं हुआ. ऐसे में 1980 में गठित भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को पकड़ लिया. नए नए चुने गए पार्टी के अध्यक्ष लाल कृष्णा अडवाणी ने शाहबुद्दीन को देशद्रोही करार दे दिया. यह पहली बार था कि किसी राजनैतिक विवाद के करण करण ऐसा आरोप लगा हो. लाल कृष्णा अडवाणी ने कहा कि "मार्च की बात कह कर शाहबुद्दीन देश को हिंसा के लिए धमकी दे रहे है." वही विश्व हिन्दू परिषद् ने शाहबुद्दीन को देश से ऊपर धर्म को रखने के लिए पूरा मुसलमानों की तीखी आलोचना किया. 
अडवाणी यही नहीं रुके. उन्होंने और आगे कहा, "यह सिर्फ कानूनी मामल नहीं है. न ही सिर्फ इतिहास का सवाल है. सवाल देश की अस्मिता का है. देश खुद को राम के साथ जोड़ेगा या बाबर के साथ? जो भी देशभक्त हो, फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, उसे राम के नाम पर आगे आना चाहिए. क्योंकि बाबर एक आक्रमणकारी था."

दंगों की शुरुआत
हिन्दू राम मंदिर को अपनी आस्था और अस्मिता की तरह देखते थे. वही वो बाबर को आक्रमणकारी मान कर उसके विरोध में थे. वही मुसलमान उनकी इस भावना को समझने में असमर्थ रहे और बाबर को अपना आदर्श मान कर राम मंदिर का विरोध करते रहे. दोनों के बीच का तनाव इस हद तक बढ़ गया की मेरठ में 14 अप्रैल को धार्मिक उन्माद भड़क उठी, परन्तु स्थानीय पुलिस ने मामला शांत करवा दिया. 19 मई 1987 के दिन तत्कालीन गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री ने मेरठ का दौरा किया. लोगो को आश्वासन दिया कि स्थित काबू में है और मेरठ के चप्पे चप्पे पर सेना, Provincial Armed Constabulary (PAC) और CRPF के जवानो को तैनात कर दिया गया. परंतु गुलमर्ग सिनेमा से शुरू हुआ तनाव बढ़ता चला गया और इसने 22 मई को दंगे का रूप ले लिया. दंगे बहुत भीषण थे. इसी वजह से सेना ने हाशिमपुरा इलाके में तलाशी और गिरफ्तारी अभियान चलाया और 644 मुसलमानों को गिरफ्तार कर PAC के हवाले कर दिया, जिसमे 150 नौजवान थे. PAC ने उन मुसलमानों को इस हद तक पीटा की कुछ पिटाई से ही मर गए और उसके बाद हाशिमपुरा कांड हो गया.
प्रशासन संभल पाए उस से पहले ही अगले दिन यानि 23 मई को मलियाना में भी दंगे भड़क उठे. यहाँ के दंगे और भी ज्यादा उग्र थे. करीब 106 घरों को आग के हवाले कर दिया गया. दंगाइयों ने दुकानों को भी आग के हवाले कर दिया. PAC और CRPF के सामने ही दंगाइयों ने कई लोगों को मौत के हवाले कर दिया. मलियाना का अधिकांश भाग तहस नहस हो गया. आग की लपटें और धुआँ इतना ज्यादा था कि वह कहाँ से उठ रही है यह पता ही नहीं चल पा रहा था. दो दिन में शहर के दो बड़े इलाके में हुए दंगे ने लखनऊ तो क्या दिल्ली को भी हिला कर रख दिया था. 
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 19 से 23 मई के बीच में ही 117 लोगों की जान गई, 623 घरों, 344 दुकानों और 14 कारखानों को लूट गया, तोड़ा गया और फिर आग के हवाले कर दिया गया. मार्च से शुरू हुआ यह दंगा जून तक चला, जिसमें बम के धमाके, पुलिस की बर्बरता, नरसंहार सामने आया.

इन दंगो के बाद से ही राम मंदिर का मुद्दा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया. 6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराने की नीव कही न कही इसी दंगे ने रख दिया था. हाशिमपुरा के मामले में न्याय के लिए हाशिमपुरा के लोगों को बहुत लम्बा इंतज़ार करना पड़ा. बल्कि मलियाना मामले तो अभी तक सुनवाई भी शुरू नहीं हुआ है. दंगो पर की जाने वाली राजनीति बहुत पुरानी है. देश की जनता को इस से दूर रहना चाहिए. क्योंकि दंगो में हमेशा साधारण लोग ही मरते है. कोई नेता कभी नहीं मरता.

जय हिन्द
वंदेमातरम



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