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1946: नओखलि नरसंहार

पिछले लेख में हमने डायरेक्ट एक्शन डे के बारे में देखा. डायरेक्ट एक्शन डे के दिन हुए नरसंहार की आग पुरे देश में फैल चुकी थी. सभी जगह से दंगों की और मारे काटे जाने की खबरें आ रही थी. इस डायरेक्ट एक्शन डे का परिणाम सामने चल कर बंगाल के नओखलि (आज बांग्लादेश में ) में देखने को मिला. यहाँ डायरेक्ट एक्शन डे के बाद से ही तनाव अत्याधिक बढ़ चूका था. 29 अगस्त, ईद-उल-फितर के दिन तनाव हिंसा में बदल गया. एक अफवाह फैल गई कि हिंदुओं ने हथियार जमा कर लिए हैं और वो आक्रमण करने वाले है. इसके बाद फेनी नदी में मछली पकड़ने गए हिंदू मछुआरों पर मुसलमानों ने घातक हथियारों से हमला कर दिया, जिसमें से एक की मौत हो गई और दो गंभीर रूप से घायल हो गए. चारुरिया के नौ हिंदू मछुआरों के एक दूसरे समूह पर घातक हथियारों से हमला किया गया. उनमें से सात को अस्पताल में भर्ती कराया गया. रामगंज थाने के अंतर्गत आने वाले बाबूपुर गाँव के एक कांग्रेसी के पुत्र देवी प्रसन्न गुहा की हत्या कर दी गई और उनके भाई और नौकर को बड़ी निर्दयता से मारा. उनके घर के सामने के कांग्रेस कार्यालय में आग लगा दिया. जमालपुर के पास मोनपुरा के चंद्र कुमा...

16 अगस्त 1946: डायरेक्ट एक्शन डे

भारत देश की स्वतंत्रता कुछ अंतर्राष्टीय घटनाओं की देन है. अन्यथा यह बात तो तय था कि अगर द्वितीय विश्व युद्ध नहीं हुआ होता और द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन को आर्थिक और सैन्य क्षति नहीं पहुँचा होता, तो कम से कम भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र नहीं हुआ होता. इसी वजह से मैंने अपने पिछले लेख " 15 अगस्त: देश का 74वां स्वतंत्रता दिवस " में लिखा था कि भारत देश को स्वतंत्रता मिला है, हमने छीन कर नहीं लिया. जब ब्रिटेन द्वितीय विश्व युद्ध में व्यस्त था तभी अगर हम भारत देश में भी विद्रोह कर देते तो स्वतंत्रता की तारीख जरूर बदल जाता. परंतु 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ऐसा कोई भी आंदोलन नहीं हुआ. बल्कि 1942 से 1947 तक भारत से अलग देश पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग ने हिंसा की ऐसी आग भड़काई, जो देश के बँटवारे के समय तक चलती रही. देश के बँटवारे से पहले ऐसे ही दो मुख्य नरसंहार हुए थे जिसमें हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था. बंगाल में हुए इन दोनों नरसंहार में मृत लोगों के मृत शरीर बंगाल की गलियों में ऐसे ही पड़े थे और गिद्ध उन्हें नोंच नोंच कर खा रहे थे. 1946 में हुए नरस...

1921: मोपला नरसंहार

भारतीय इतिहास में कई ऐसी घटनाएँ हुई है, जिसे या तो गलत तरीके से हमारे सामने रखा गया है या फिर आधा ही पहलु सामने रखा गया है. ऐसी एक दो घटनाएँ नहीं हुई है भारतीय इतिहास में, बल्कि भारतीय इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है. उन्ही में से एक है मोपला दंगे. वैसे इसके लिए सही शब्द होगा मोपला नरसंहार. परंतु हमारे इतिहास में इसे मोपला विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है. केरला के मुस्लिम बहुल्य इलाके में हुए इस नरसंहार में हिन्दुओं को मोपला मुसलमानों के द्वारा निशाना बनाया गया था. मोपला मुसलमानों ने हजारों की संख्या में हिन्दुओं, जिसमें बच्चे, बूढ़े और औरतें भी थे, को निर्दयता से मौत के घाट उतार दिया था. हिन्दू औरतों का बलात्कार किया गया, हिन्दुओं की सम्पति को लुटा गया. इस तरह से यह नरसंहार हुआ था. आइए जानते है इसके बारे में.

1987: मेरठ दंगा जिसने अयोध्या विवाद के नीव को रखा

भारत देश की आजादी से पहले ही इस देश में दंगे होते रहे है. फिर चाहे वह 1921: मोपला नरसंहार हो या फिर 1946 में हुआ नओखलि दंगा हो या फिर देश के आजाद होते ही हुआ दंगा हो. उसके बाद देश के अलग अलग राज्यों में चाहे जो भी राजनैतिक पार्टी की सरकार रही हो, सभी के सरकार में रहते हुए दंगे हुए ही है. कभी जी न्यूज़ का हिस्सा रहे और फिलहाल आज तक में कार्यरत पत्रकार ने एक बार कहा था कि, "चाहे कोई भी पार्टी हो, खून के धब्बे हर एक पार्टी के दामन पर है." ऐसा ही एक दंगा था 1987 में हुआ मेरठ का दंगा. मेरठ में दंगो का लम्बा इतिहास रहा है. मेरठ में 1961, 1968, 1973, 1982 में दंगे हुए है,  जो  कभी दो व्यक्ति के झगडे से दो समुदायों के बीच का झगड़ा बन गया, तो कभी म्युनिसिपल जमीन को लेकर हुए झगड़ो ने दंगे का रूप ले लिया.  परंतु 1987 का दंगा इस वजह से  खास  था, क्योंकि यही से अयोध्या राम मंदिर विवाद की नीव पड़ी.