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Showing posts with the label गुमनाम क्रांतिवीर

एक ऐसा क्रांतिकारी जिसे दुबारा मारा गया!

कहते है कि कोई इंसान एक बार अगर मर जाए, तो उसे दुबारा नहीं मरा जा सकता. परन्तु आज हम जिस क्रांतिकारी के बारे में बात करने वाले है, उसे दुबारा मारा गया और हर एक एक कोशिश की गई, जिस से वह जनता तक नहीं पहुँच पाए. यहाँ तक कि उसकी लिखी हुई किताबों तक को दबाने की कोशिश की गई. उस क्रांतिकारी का कहना था कि "इंसान का शरीर कैद किया जा सकता है, उसके विचार नहीं. इंसान के शरीर को मारा जा सकता है, उसके विचार को नहीं." परंतु इस क्रांतिकारी के विचार को भी मारने का हर संभव कोशिश किया गया और ऐसा कोशिश कि न ही उसके बारे में ज्यादा लिखा गया और न ही ज्यादा पढ़ाया गया. बस उसे एक गुमनाम बनाने के लिए पूरी तरह से कमर कसा जा चूका था. परंतु यह उस क्रांतिकारी की प्रसिद्धि ही है, जो इतना सब कुछ करने के बाद भी वह आज युवाओं के बीच प्रसिद्ध है और हर एक युवा के दिलों पर राज करता है. उसका नाम आते ही सभी के सर उसके सम्मान में झुक जाते है. मैं बात कर रहा हूँ, एक 5 फुट 10 इंच लम्बे और बहुत ही खूबसूरत नौजवान, जिसे लड़कियों से बचाते बचाते उनके साथी परेशान हो जाते थे, सरदार भगत सिंह संधू के बारे में. आइए उनके बारे म...

गुमनाम क्रांतिवीर : भगवती चरण वोहरा

भारत वर्ष हमेशा से ही वीरों का देश रहा है. भारत की भूमि पर ऐसे भी महान वीर हुए है, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह ना करते हुए निस्वार्थ भाव से मातृभूमि की सेवा करते हुए अपने प्राण हँसते हँसते मातृभूमि पर ही नौछावर कर दिया है. जब जब बात क्रांतिकारियों की आती है तब सिर्फ भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ पंडित जी तक ही सिमट कर रह जाती है. आज मैं उस महान क्रांतिकारी के विषय में बताऊंगा, जो थे तो उन क्रांतिकारियों के साथी, पर शायद ही कोई उनके बारे में सही से जानता है. बात कर रहे है अपने साथियो में "भाई" ने नाम से मशहूर भगवती चरण वोहरा के बारे में.

गुमनाम क्रन्तिवीर: कोमरम भीम

कोमरम भीम, ये नाम किसी परिचय का मौहताज नहीं होता, अगर हमें मुगल और अंग्रेजों के इतिहास की स्थान पर हमारे इतिहास से जुड़े लोगों के बारे में पढ़ाया जाता. फिर चाहे वो नायक, हो खलनायक हो या गद्दार हो. हमारे लिए हमारे अतीत को जानना ज्यादा जरुरी है. खैर. ये है तेलंगाना के आदिवासी नेता कोमरम भीम, जिन्होंने जल, जंगल और जमीन का नारा दिया था. बाहुबली से ज्यादा      चर्चित हुए SS राजामौली की आगामी फिल्म RRR, जिन दो क्रांतिकारियों पर आधारित है उनमे से एक कोमरम भीम है, जिसके किरदार में Jr NTR नज़र आने वाले है.  बिरसा मुंडा, सिद्दू कान्हू जैसे अन्य आदिवासी नायको की तरह कोमरम भीम का नाम भी प्रचलित होना चाहिए था. परन्तु वो सिर्फ एक स्थानीय नायक बन कर रह गए. यह हमारे शिक्षा प्रणाली का दोष है और कुछ नहीं.

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक, जिन्हे लोकमान्य तिलक के नाम से भी जाना जाता है. लोकमान्य अर्थात लोगों द्वारा माना गया या स्वीकृत किया गया. तिलक, जिनके मृत्य पर गाँधी ने कहा था, "आज हमने आधुनिक भारत के निर्माता को खो दिया है." लोकमान्य तिलक, जिन्होंने सर्वप्रथम पश्चात् शिक्षा का विरोध किया था. बाल गंगाधर, जो शायद भविष्य भी देख सकते थे. उनके कई निर्णय इस बात को सिद्ध भी करते है. बाल गंगाधर तिलक, जिन्होंने पराधीन भारत में ही स्वदेशी और राष्ट्रिय शिक्षा का नारा दिया था. ऐसे महान क्रांतिकारी, विद्वान शिक्षक बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक के बारे में थोड़ा देखेंगे. जन्म और बाकि जानकारी तो आपको आसानी से इंटरनेट पर मिल जाएगी, परन्तु उनके जीवन के उसी पहलु को एक अलग नजरिए से देखने का प्रयत्न करेंगे. प्रारंभिक जीवन 23 जुलाई 1856 के दिन महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरी) के चिखली गांव में पंडित गंगाधर रामचंद्र तिलक के घर एक पुत्र का जन्म हुआ था. नाम रखा गया बाल गंगाधर तिलक. तिलक संस्कृत और गणित के प्रखंड विद्वान थे. साथ ही साथ वो एक राष्ट्रवादी, शिक्षक, पत्रकार, समाज सुधारक, वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे. ...

चंद्रशेखर "आजाद", जो वास्तव में आजाद थे

सोच उम्र की मुताज नहीं होती है. कई बार छोटी सी उम्र में भी कई लोग इतने बड़े बड़े काम कर देते है कि उम्र में उन से बड़े लोग भी उसने सम्मान में अपना सर झुका देते है. देश के आज़ादी के समय का माहौल भी कुछ ऐसा ही था. एक तरफ जहा बूढ़े लोग अहिंसा के मार्ग पर चलने कि प्रेरणा दे रहे थे, उसी समय कुछ नौजवान खून जिनका अहिंसा वाली लड़ाई पर से विश्वास उठ चूका था, वो देश कि आजादी के लिए लड़ने मरने तक को तैयार थे. भगत सिंह, सुखदेव, जतिन दास, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, खुदीराम बोष, प्रफुल चाकी, भगवती चरण वोहरा, चंद्रशेखर आजाद इत्यादि इनमें प्रमुख थे. इन सभी क्रांतिकारियों की आयु उस समय महज 14 से 16 वर्ष की रही होगी, जब ये लोग गाँधी द्वारा चलाये असहयोग आंदोलन में कूद पड़े थे. और गाँधी के चौरी चौरा कांड के बाद अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लेने से इस सभी के मन को ऐसी चोट पहुंची कि सभी अपने प्राणों की परवाह किये बिना आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और मरने मारने को तैयार हो गए. आज हम बात करने जा रहे है ऐसे क्रन्तिकारी की, जिन्होंने अपने नाम में ही "आजाद" जोड़ लिया था और वह इसी नाम से मशहूर हुए.