लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक Skip to main content

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक, जिन्हे लोकमान्य तिलक के नाम से भी जाना जाता है. लोकमान्य अर्थात लोगों द्वारा माना गया या स्वीकृत किया गया. तिलक, जिनके मृत्य पर गाँधी ने कहा था, "आज हमने आधुनिक भारत के निर्माता को खो दिया है." लोकमान्य तिलक, जिन्होंने सर्वप्रथम पश्चात् शिक्षा का विरोध किया था. बाल गंगाधर, जो शायद भविष्य भी देख सकते थे. उनके कई निर्णय इस बात को सिद्ध भी करते है. बाल गंगाधर तिलक, जिन्होंने पराधीन भारत में ही स्वदेशी और राष्ट्रिय शिक्षा का नारा दिया था. ऐसे महान क्रांतिकारी, विद्वान शिक्षक बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक के बारे में थोड़ा देखेंगे. जन्म और बाकि जानकारी तो आपको आसानी से इंटरनेट पर मिल जाएगी, परन्तु उनके जीवन के उसी पहलु को एक अलग नजरिए से देखने का प्रयत्न करेंगे.

प्रारंभिक जीवन
23 जुलाई 1856 के दिन महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरी) के चिखली गांव में पंडित गंगाधर रामचंद्र तिलक के घर एक पुत्र का जन्म हुआ था. नाम रखा गया बाल गंगाधर तिलक. तिलक संस्कृत और गणित के प्रखंड विद्वान थे. साथ ही साथ वो एक राष्ट्रवादी, शिक्षक, पत्रकार, समाज सुधारक, वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे. तिलक अंग्रेजी शिक्षा के आलोचक थे. क्योकि अंग्रेजी शिक्षा भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है. इन्होंने दक्कन शिक्षा सोसाइटी की स्थापन किया, जो भारत में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए काम करता था. इन्होंने अंग्रेजी में द मराठा और मराठी में केसरी नामक दो दैनिक समाचार को प्रकाशित करना शुरू किया. इसमें वो अंग्रेजो की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजों की हीन भावना के बारे में काफी आक्रामक लेख लिखते थे. इसी वजह से इन्हे कई बार जेल जाना पड़ा.

गणेश उत्सव मानाने की शुरुआत
तिलक 1890 में कांग्रेस से जुड़े थे. उस समय अंग्रेजों ने सामाजिक और राजनैतिक करने से लोगों के इकठ्ठा होने पर रोक लगा दिया था. इस से स्वतंत्रता के लिए गतिविधियों में बाधा आ रही थी. इसी का तोड़ निकालने के लिए तिलक ने 1893 में गणेश उत्सव को सामाजिक और धार्मिक त्यौहार के रूप में मानना शुरू किया, जिसमे हर एक जाति के लोग इकठ्ठा होते थे और साथ में पूजा करते थे. ऐसे में जो भी समाचार यहाँ वह भेजना होता था, वह भी आसानी से पहुँचा दिया जाता था. मुग़ल आक्रमण के समय अपने धर्म को बचने के लिए हिन्दू धर्म में आई संकुचितता को दूर करने में मदद मिली. इसी धार्मिक त्यौहार के बीच तिलक लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के क्रूर शासन के प्रति जागृत करते थे और स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे.

सूरत विभाजन
कांग्रेस का गठन 28 दिसंबर 1885 में एक सेवा निवृत अंग्रेज अधिकारी ए ओ ह्यूम के नेतृत्व में हुआ था. इसके पीछे लार्ड डफरिन का दिमाग था. वह अंग्रेजी हुकूमत के लिए एक सेफ्टी वाल्व बनाना चाहता था और उसी के दिमाग की उपज थी कांग्रेस पार्टी. कांग्रेस के शुरुआती नेता अंग्रेजों के सामने कोई माँग विनती के स्वर में रखते थे. वो अंग्रेजी हुकूमत के पक्षधर थे, इसी वजह से कांग्रेस के इस दौर को भिक्षावृति का दौर भी कहते है. और इस नेताओं को दल का नेता कहा गया. वही एक पक्ष ऐसा भी था, जो माँगने में नहीं बल्कि अपना अधिकर के लिए लड़ने में मानता था. वो अंग्रेजी सत्ता को उखड फेकना चाहता था. ऐसे नेताओं को गरम दाल का नेता नेता कहा गया. नरम दल और गरम दल के विचारों में फर्क.

उदारवादी (नरमपंथी) उग्रवादी (अतिवादी)
सामाजिक आधार-जमींदार एवं शहरों के उच्च माध्यमवर्गीय लोगों के बीच सामाजिक आधार-शहरों के शिक्षित एवं निम्न मध्यवर्गीय लोगों के बीच
सैद्धांतिक प्रेरणास्रोत- पाश्चात्य उदार विचार एवं यूरोपीय इतिह्रास सैद्धांतिक प्रेरणास्रोत- भारतीय इतिह्रास, सांस्कृतिक विरासत एवं परम्परागत हिन्दू मूल्य
ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास ब्रिटिश न्यायप्रियता में कोई विश्वास या निष्ठा नहीं
इनका विश्वास था कि ब्रिटेन के साथ राजनीतिक सम्बंध भारत के सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हितों के लिये लाभप्रद होंगे इनका मानना था की ब्रिटेन के साथ राजनितिक सम्बन्ध रहने से भारत का आर्थिक शोषण जारी रहेगा
ब्रिटिश ताज के प्रति पूर्ण निष्ठा इनका विश्वास था की ब्रिटिश ताज भारतीय निष्ठा के प्रति अयोग्य है
इसका मानना कि सरकार विरोधी आन्दोलन मध्यवर्गीय शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रहना चाहिए क्योंकि जनसामान्य अभी राजनीतिक कार्यों में सक्रिय भागीदार निभाने के लिए तैयार नहीं है इन्हें जनसामान्य की शक्ति एवं त्याग की भावना में पूर्ण निष्ठा थी
सरकारी सेवाओं में भारतीयों की सहभागिता बढ़ाने एवं संवैधानिक सुधारों की मांग की भारतीय दुर्दशा को दूर करने हेतु स्वराज्य की मांग की
केवल संवैधानिक दायरे में रहकर लक्ष्य पाने में विश्वास रखते थे आवश्यकता पड़ने पर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए असंवैधानिक तरीकों- जैसे बहिष्कार एवं अहिंसात्मक प्रतिरोध से परहेज नहीं
पाश्चात्य शिक्षा एवं सभ्यता के समर्थक भारतीय समारोहों के आयोजन तथा प्रेस, शिक्षा एवं भारतीय साहित्य के समर्थक

1905 में बनारस में गोपालकृष्ण गोखले की अध्यक्षता में हुए अधिवेशन में दोनों दलों के बीच का मतभेद सामने आया. तिलक ने नरम दल के नेताओं के विनती वाले स्वर, अंग्रेजों के प्रति सहयोग की भावना और उदार नीति का कटु शब्दों में निंदा किया. तिलक चाहते थे कि स्वदेशी अपनाने और अंग्रेजों के बहिष्कार का आंदोलन को देशव्यापी कर देना चाहिए. परंतु नरम दल के नेता इसे बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे. नरम दल के नेता चाहते थे कि उनके प्रस्ताव को सभी चुप चाप मान ले. यहीं से नरम दल और गरम दल के बीच में वैचारिक मतभद शुरू हो चुके थे.
1906 में यह मतभेद वापस से शुरू हुआ अध्यक्ष पद को लेकर. नरम दल के नेता राष बिहारी घोष को अध्यक्ष चुनना चाहते थे. वहीं गरम दल के नेता लाला लाजपत राय को. बाद ने दादा भाई नौरा जी अध्यक्ष चुन कर विवाद को टाला गया. परंतु उस अधिवेश में जो प्रस्ताव पारित हुए, वह गरम दल के नेताओं से प्रभावित थे. यह गरम दल की जीत मणि जा रही थी और कांग्रेस पार्टी में उनके बढ़ते वर्चस्व के तरफ इशारा कर रहा था.
1907 का अधिवेशन नागपुर में होना था. परंतु नागपुर को गरम दल के नेताओं का गढ़ माना जाता था. इसी वजह से अधिवेशन सूरत में होना तय हुआ. तिलक वहाँ भी पहुँच गए. तिलक बस यह आश्वासन चाहते थे कि कांग्रेस पार्टी अपने स्वराज और स्वदेशी के किये वादे पर तिकी रहे उस से पीछे न हटे. परंतु नरम दल के नेता नहीं माने और कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई.
जब कांग्रेस के नेता अंग्रेजी शासन को स्वीकार कर उसकी सहायता कर रहे थे और बाद में डोमिनियन स्टेटस की माँग किया था, उस से काफी समय पहले ही तिलक ने कहा था, "स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा." कांग्रेस के नरम दल के नरम दल के नेताओं का देश के प्रति जो निराशाजनक व्यव्हार था, उसे तिलक ने भाँप लिया था.
"देश के पवित्र स्वाधीनता संग्राम में, मत भूलो की तुम हिन्दू हो." 1906 में ही मुस्लिम लीग की स्थापन हो गई थी. मुस्लिम लीग के नेताओं का अपने धर्म के प्रति आक्रामक तेवर देख कर उन्हें शायद हिन्दुओं की चिंता हुई इसी वजह से उन्होंने ने यह नारा दिया था. और वह शायद गलत भी नहीं थे. 1921 में हुआ मोपला नरसंहार उसी बात का उदहारण है.
तिलक ने अंग्रेजी शिक्षा का विरोध यह कहते हुए किया था कि "अंग्रेजी शिक्षा भारतीय संस्कति का मजाक बनती है और नीचा दिखती है." उन्होंने जो कुछ आज से 100 वर्ष पहले कहा था, वह आज सच ही शाबित हो रहा है. इसका उदहारण देने की जरुराण नहीं है.
उनके द्वारा शुरू किये गणेश उत्सव आए भी बड़े धूम धाम से मनाया जाता है. गणपति की स्थापना से गणपति के विसर्जन तक, वहीं जाति के लोग उस उत्सव में भाग लेते है और बड़े धूम धाम से इस उत्सव को मानते है.
परंतु तिलक को केवल हिन्दू नेता तक ही सीमित कर दिया गया. तिलक के इस दूरदृष्टि को न ही किसी ने समझने का प्रयत्न किया और न ही अपनाने का. तिलक केवल हिन्दुओं के नेता नहीं थे. तिलक अंग्रेजी शासन की वकालत करने वाले नेताओं के बीच स्वराज की माँग करने वाले नेता थे. पश्चात शिक्षा से भारतीय संस्कृति पर होने वाले दूरगामी परिणाम को समझ कर उसका विरोध करने वाले नेता थे. ऐसे महान नेता और शिक्षक को हमारा नमन है.

जय हिन्द
वंदेमातरम


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