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कविता: भारत देश

भारत में अक्सर बहस होता रहता है कि एक धर्म विशेष पर बहुत जुल्म हो रहे है. उन्हें परेशान किया जा रहा है. परंतु सच यह है कि वह धर्म विशेष भारत देश में जितने आराम से और स्वतंत्रता से रह रहे हैं, उतनी स्वतंत्रता से वह कहीं और नहीं रह सकते. यह वही भारत देश है, जहाँ वोट बैंक की राजनीती के लिए लोगों को उनके जाति और धर्म के नाम पर बाँटा जाता है. जहाँ का युवा "इस देश का कुछ नहीं हो सकता" कह कर हर बात को टाल देता है. जहाँ देश भक्ति सिर्फ क्रिकेट मैच या आतंकवादी हमले पर ही जागती है. जहाँ जुर्म होते देख गाँधी की अहिंसा याद आती है. इन्ही सभी बातों को ध्यान में रख कर कुछ दिन पहले मैंने एक कविता लिखा था, जिसे आप सब के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसका शीर्षक है, "भारत देश"

भारत देश

एक तरफ देश की सीमा पर,
सिपाही अपना खून बहता है.
वहीं कड़ी सुरक्षा में रहने वाला,
खुद को असुरक्षित पाता है.
जहाँ कायर शराफत की चादर ओढ़े है,
और अपराधी देश को चलता है.
जहाँ अपनी गलती कोई नहीं मानता,
पर दूसरों को दोषी ठहराता है.
वही ए मेरे प्यारे दोस्त,
भारत देश कहलाता है.

जहाँ इंसान को इंसानियत से नहीं,
भाषा, धर्म जाति से पहचाना जाता है.
जहाँ इस देश का कुछ नहीं हो सकता कह,
हर बात को हर बार टाला जाता है.
जुर्म होते देख गाँधी को याद कर,
वहाँ से आँख बंद कर निकल जाता है.
जहाँ क्रिकेट और आतंकी हमले पर ही,
अपना देश सभी को याद आता है.
वही ए मेरे प्यारे दोस्त,
भारत देश कहलाता है.

जय हिन्द
वंदेमातरम

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