संजय गाँधी: प्रधानमंत्री माँ का ताकतवर बेटा Skip to main content

संजय गाँधी: प्रधानमंत्री माँ का ताकतवर बेटा

सत्ता मे न होते हुए भी ताकत इसी इंसान के पास थी. इंदिरा सिर्फ नाम की प्रधानमत्री रह गई थी. इनके जीवित रहने तक हर एक फैसला लगभग यही करते थे. महज 25 वर्ष की आयु में इनका विवादों से नाता जुड़ा और ऐसा जुड़ा की मरने के बाद भी यह नाता नहीं टुटा. मारुती कार हो, 1975 का आपातकाल हो या फिर नसबंदी हर जगह इनका नाम जुड़ता रहा है. 1980 तक किसी भी पद पर नहीं होने के बाद भी किसी में हिम्मत नहीं थी कि इनकी बात काट दे. उस समय कांग्रेस के कई नेताओं के सर इनके आगे झुकते थे. मैं बात कर रहा हूँ स्वाभाव से जिद्दी किसी नियम को न मानाने वाले और तेज रफ्तार को पसंद करने वाले कांग्रेस के युवा नेता और एक प्रधानमंत्री के सबसे प्यारे बेटे संजय गाँधी के बारे में.


परिचय
वैसे तो गाँधी परिवार के किसी भी नाम को किसी परिचय की कोई जरुरत नहीं है, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और फ़िरोज़ गाँधी के छोटे बेटे संजय गाँधी का जन्म 14 दिसंबर 1946 को हुआ था. संजय गाँधी, राजीव गाँधी के छोटे भाई और माँ इंदिरा गाँधी के बेहद करीब थे.
अपने बड़े भाई राजीव गांधी की तरह, संजय की शिक्षा भी सेंट कोलंबा, दिल्ली, वेल्हम बॉयज़ स्कूल, देहरादून और फिर दून स्कूल, देहरादून में हुई और उसके बाद स्विट्जरलैंड के एक अंतर्राष्ट्रीय बोर्डिंग स्कूल इकोले डी'हुमनीटे में रह कर भी पढाई किया. संजय ने आगे की पढाई किसी विश्वविद्यालय में किया, लेकिन ऑटो मोबाइल  इंजीनियरिंग को अपने कैरियर के रूप में चुना. तीन वर्षों के लिए इंग्लैंड के क्रेवे में रोल्स-रॉयस के साथ एक इंटर्नशिप के रूप में काम किया। संजय को स्पोर्ट्स कारों में बहुत रुचि थी और 1976 में उन्होंने पायलट लाइसेंस भी प्राप्त किया। उसके बाद भारत आए.

मारुती मोटर्स लिमिटेड के निदेशक
भारत लौटने के बाद संजय गाँधी के दबाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की कैबिनेट ने 1971 में  एक ऐसी गाड़ी बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसे मध्यम वर्गीय परिवार आसानी से खरीद सके. इस प्रस्ताव को पारित भी कर दिया गया. सरकार ने मारुती मोटर्स लिमिटेड नाम की कंपनी को गठित करने की मंज़ूरी दे दी और उसका निदेशक और प्रबंधक संजय गाँधी को बनाया. देखने वाली बात यह है कि संजय को किसी खास अनुभव न होने के बाद भी ऐसी ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.
इसको लेकर खूब हंगामा हुआ. हालांकि, जब भी आवाज उठाई जाती उसको सरकार दबा देती. दबाव ज्यादा बढ़ने पर संजय ने जर्मन की बहुप्रतिष्ठित कंपनी फोक्सवैगन के साथ करार भी किया, लेकिन यह करार भी परवान न चढ़ सका और आपातकाल के दौरान फिर से इसका मुद्दा ठंडा हो गया. आपातकाल के बाद, जब जनता दल की सरकार बनी तो इस परियोजना के लिए न्यायमूर्ति ए. पी गुप्ता की अध्यक्ष्ता में एक कमीशन का गठन किया गया. कमीशन ने इस कंपनी के काम-काज की आलोचना की. संजय की मारुती कंपनी ने संजय के जीवन में कोई भी कार माडल पेश न कर सकी. उनकी मृत्यु के लगभग एक साल बाद मारुती ने जापानी कंपनी सुजुकी के साथ मिल कर ने जनता के लिए पहली कार 'मारुती सुजुकी 800' को पेश किया.

युथ कांग्रेस
संजय के बढ़ते वर्चस्व ने आंतरिक तौर पर दो पावर सेंटर बना दिए थे. इन दो खेमों में एक तरफ संजय के समर्थकों और दूसरी तरफ इंदिरा के वफादार थे. इसी के चलते संजय गांधी ने अपने वफादारों के साथ यूथ कांग्रेस बनाई. यही युथ कांग्रेस आपातकाल के दौरान 'दबंग कांग्रेस' के तौर पर उभर कर सामने आई. मुख्य तौर पर यह संजय के महत्वकांक्षा का ही परिणाम था. वे बिना जिम्मेदारी और पद के सत्ता का स्वाद चखना चाहते थे. वे एक युवा कांग्रेस टीम चाहते थे, जो इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस का मुकाबला कर सके. बिना देर किए संजय गांधी ने युवा कांग्रेस यूथ कांग्रेस के लिए पूरे देश में अभियान चलाया. इसमें कोई भी व्यक्ति यूथ कांग्रेस के साथ जुड़ सकता था. इसके लिए किसी पात्रता की जरूरत नहीं थी. अगले कुछ महीनों में, इसकी सदस्य संख्या 60 लाख को हो गई. इसमें गुंडों और गैंगस्टरों द्वारा घुसपैठ की गई. ताकि वे इसकी आड़ में कानून को अपने हाथ में ले सकें. 

आपातकाल
1975 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा था तब संजय गाँधी ही थे जिसने इंदिरा को कुर्सी न छोड़ने और जरूरत पड़ने पर आपातकाल लगाने की बात कहा. इंदिरा पहले तो तैयार नहीं हुई पर बाद में आपातकाल लगाने के को तैयार हो गई और 25 जून 1975 को भारत के इतिहास का काला दिन आपातकाल लगा दिया गया. यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक चला और इसी आपातकाल के दौरान संजय गाँधी के दबंग राजनीती से सबका परिचय हुआ.
आपातकाल के दौरान संजय गाँधी के वर्चस्व का पता इसी बात से लगता है कि किसी भी राजनैतिक पद पर नहीं होने के बाद भी कांग्रेस के 20 सूत्री कार्यक्रम के बदले अपना 5 सूत्री कार्यक्रम जारी किया. और वो 5 सूत्री कार्यक्रम थे
  • व्यस्क शिक्षा
  • जाती व्यवस्था उन्मूलन
  • पेड़ लगाना
  • दहेज़प्रथा को समाप्त करना
  • नसबंदी करवाना
बाद में हर बात से ध्यान हटा कर सिर्फ नसबंदी पर ध्यान लगाया.

नसबंदी
वैसे यह कार्यक्रम तो कागज पर बहुत अच्छा लग रहा था, लेकिन संजय गाँधी के दबंगई और उनके नज़र में बने रहने के लिए अधिकारियो ने जो किया, वो खतरनाक था. यूथ कांग्रेस ने पहले 4 बिंदुओं को अनदेखा कर केवल 5वें यानी नसबंदी पर पूरा ध्यान केंद्रित किया. संजय गाँधी के सामने कांग्रेस के नेता ही नहीं बल्कि सरकारी नौकर भी घुटने टेक चुके थे. तभी तो संजय गाँधी ने एक फरमान जारी और और इसके बाद स्वैच्छिक नसबंदी कार्यक्रम एक खौफनाक प्रक्रिया में बदल गया. इसमें हर सरकारी कर्मचारी को एक निश्चित संख्या में ऐसे पुरुषों को लाना होता था, जिनके दो बच्चे होते थे. जो अधिकारी अपना लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता, वह प्रमोशन के लिए पात्र नहीं रहता था. ऐसे में सरकारी कर्मचारियों ने प्रमोशन के चलते टारगेट से अधिक लोगों की नसबंदी करा दी अधिकारी संजय की नजर में अच्छा बने रहने के लिए अधिक से अधिक नसबंदी कराने के लिए बेताब थे. लेकिन यह कार्यक्रम कांग्रेस के लिए नासूर बन गया. मुस्लिमों ने इस कार्यक्रम का जारेदार विरोध किया और बात दंगे और गोलीबारी तक आ पहुँची. इससे कांग्रेस का वोट बैंक भी प्रभावित हुआ. ऐसी खबरें जब पूरे देश में फैलीं तो लोगों को स्वास्थ्य शिविरों की वास्तविक स्थिति के बारे में पता चला. स्थिति ये हो गई थी, जैसी ही लोग किसी मेडिकल वैन या एंबुलेंस को देखते थे, भागने लगते थे.

किशोर कुमार का गाना और किस्सा कुर्सी का
संजय गाँधी ने मशहूर गायक किशोर कुमार को यूथ कांग्रेस के लिए गाना गाने को कहा. पर किशोर कुमार ने गाना गाने से इंकार कर दिया. संजय गाँधी को यह बात बिलकुल भी पसंद नहीं आई. इससे नाराज होकर संजय के इशारे पर उनके गानों को 'आल इंडिया रेडियों' पर बैन कर दिया गया था.
अमृत नहाटा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ के जरिए इंदिरा और संजय को लपेटने की कोशिश की गई, तो सेंसरबोर्ड की सात सदस्यों वाली कमेटी ने इसको पास न करते हुए सरकार के पास भेज दिया. वहां से आगे बढ़ती हुई यह फिल्म 'सूचना प्रसारण मंत्रालय' पहुंची. वहां फिल्म में 51 आपत्तियों सहित कारण बताओं नोटिस जारी कर दिया गया. नोटिस भेजने के बाद अमृत ने कहा कि फिल्म में सारे पात्र काल्पनिक हैं. उनका किसी भी पार्टी या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. इसके बावजूद इस फिल्म को सेंसरबोर्ड ने लटका दिया. इसी बीच आपातकाल लागू हो गया. इस मौके का फायदा उठाते हुए फिल्म के मास्टर प्रिंट सहित उसके कागजों को सेंसर बोर्ड से गायब कर दिया गया. कहते है उसके प्रिंट को मारुती मोटर्स की फैक्टरी में लाकर जला दिया गया, जिसके बाद संजय गांधी व सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण को दोषी ठहराते हुए दोनों पर मुकदमा चलाया गया था. 11 महीने तक चले इस मुकद्दमे के तहत दोनों को कैद की सजा सुनाई गई थी. हालांकि, बाद में इसे ख़त्म कर दिया गया.
दिल्ली से झुग्गियों की सफाई
नसबंदी के अलावा, संजय ने एक और कार्यक्रम चलाया दिल्ली से झुग्गियों की सफाई का. इस कार्यक्रम के अंतर्गत सैकड़ों झुग्गियों को बेरहमी से तोड़ दिया गया और झुग्गी में रहने वाले लोगों के लिए पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं की गई. जब लोगों ने विरोध किया तो उन पर और उनके घरों पर पुलिस ने गोलियां बरसाई.
इसका सबसे चर्चित मामला तुर्कमान गेट झुग्गी का था. 18 अप्रैल 1976 ने इस इलाके में पुलिस झुग्गी खाली करवाने पहुँची तो यहां कई प्रदर्शनकारियों और पुलिस की बीच झड़प हुई. पुलिस मस्जिद में घुस चुकी थी और पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े. वहाँ की जनता भड़क गई. और पुलिस पर हमला कर दिया और पुलिस स्टेशन को घेर लिया. इसके बाद पुलिस कमिश्नर ने वहाँ कर्फ्यू लगा दिया और वहाँ गोलीबारी और लूट की घटनाएँ सामने आई. इस इलाके में जो बुलडोजर 18 अप्रैल की रात से चलना शुरू हुए वह 22 की सुबह तक चलते रहे. लेकिन सेंसरशिप के कारण, यह भारतीय समाचार में नहीं छप सका।
इसके अलावा संजय गांधी पर सबसे गंभीर आरोप था इमरजेंसी के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी का आदेश देना, कड़ाई से सेंसरशिप लागू करना और सरकारी कामकाज में बिना किसी आधिकारिक भूमिका के हस्तक्षेप करना. जब उन्हें लगा कि इंदर कुमार गुजराल उनका कहना नहीं मानेंगे तो उन्हें उनके पद से हटा दिया गया.
ऐसा कहा जाता है कि जनता की यादास्त बहुत काम होती है. शायद इसी वजह से 1975 में जिस आपातकाल लगाने वाली प्रधानमंत्री को जनता ने 1977 में सत्ता से बहार कर दिया था उसी को 1980 में लोकसभा चुनाव में जनता ने वापस से चुन कर प्रधानमंत्री बना दिया और संजय गाँधी भी अमेठी से विजयी रहे. 23 जून 1980 में ही एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई.
परन्तु संजय गाँधी अपनी मृत्यु के पहले ही सत्ता का सुख बिना किसी पद पर रहे ही भोग लिया था. 

जय हिन्द
वन्देमातरम

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