चीन किन कारणों की वजह से पीछे हटने को हुआ मजबूर? Skip to main content

चीन किन कारणों की वजह से पीछे हटने को हुआ मजबूर?

 15 जून की रात में गलवान घाटी में हुए चीन के कायराना हमले, जिसमे भारत देश के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे, के बाद से भारत ने चीन के लिए अपना रुख कड़ा और स्पष्ट कर दिया था. भारत ने सबसे पहले तो गलवान घाटी में सेना की अतिरिक्त टुकड़ी को भेजने से लेकर, वायुसेना के लड़ाकू विमानों को भेजने, रक्षा के थल, जल और वायु तीनो विभागों को किसी से स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहने और LAC पर पुराने समझौते को तोड़ कर जरुरत पड़ने पर गोली और तोप चलने तक की इजाजत देने जैसे कदम उठाये है.

इस से चीन को सीधा और साफ़ सन्देश देना था कि भारत अपने जमीन का एक इंच हिस्सा भी नहीं देगा और गलवान जैसी घटना को अब बर्दास्त नहीं करेगा. हालाँकि बिहार रेजिमेंट के जवानों ने चीन के कायराना हमले का मुँह तोड़ नहीं गला तोड़ (बिहार रेजिमेंट के जवानो ने काम से काम 18 चीनी सैनिको का गला तोड़ दिया था) कर चीनी सैनिकों को जवाब तो दे दिया था, परन्तु ऐसी घटना भविष्य में न हो इसके लिए कड़ी चेतावनी भी दे दिया है. भारत ने सीमा पर हर एक तरह की स्थिति से निपटने की पूरी तयारी करने के बाद भी शांति बहाल करने का मार्ग नहीं छोड़ा. 22 जून को
मोल्डो में 14 कोर के लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह और चीन के मेजर जनरल लिउ लिन के बीच की बैठक सकारात्मक रही और चीन भारत की हर शर्त मान कर पीछे हटने और 5 मई से पहले वाली स्थिति को बरकरार करने को तैयार हो गया है. चीन किन कारणों की वजह से पीछे हटने को हुआ मजबूर?

राजनैतिक कारण 
भारत देश में बहुमत की सरकार है. इसी वजह से उसे कोई भी निर्णय लेने के लिए अपने सहयोग दलो के समर्थन या अनुमति की जरुरत नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ना सिर्फ चीन के प्रति अपना रुख आक्रामक रखा, बल्कि LAC पर सैनिको की अतिरिक्त नियुक्ति करवा दिया और साथ ही साथ भारतीय सेना को LAC जरुरत पड़ने पर गोली और तोप चलने की छूट भी दे दिया. उसके बाद भारत सरकार की तरफ से देशवाशियों को संबोधित करने के अलावा चीन की तरफ ध्यान तक नहीं दिया. विपक्षी दाल चाहे जो बोले, पर बयानबाजी वही करता है जो घबराया होता है.

सैन्य कारण 
1962 नेहरू चीन युद्ध के बाद चीन जितनी बार भारत से टकराया है उतनी बार भारतीय सेना के जवानों ने चीनी सैनिकों को पीछे धकेला. धकेलने से मतलब यह है कि भारत अभी फिंगर 4 पर है और फिंगर 8 तक पेट्रोलिंग करता था.
मगर चीनी सैनिको कभी भी फिंगर 8 में मौका मिलते ही घुस जाते थे और तम्बू लगा कर बैठ जाते थे. ऐसे में भारतीय सैनिक चीनी सैनिको को उनके तम्बू के साथ पीछे हटने को मजबूर किया है. नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने है भारतीय सेना में एक अलग सा ही जोश है. मुझसे एक सेवा निवृत कर्नल ने कहा था कि मोदी के आने की बात से ही सेना में बहुत जोश है. अब हमे ऐसा लग रहा है कि  हमारे लिए कोई वरना पहले तो सीमा पर हम अकेले होते थे. पर इस बात सेना को खुली छूट मिली हुई है सीमा पर और सेना ने गलवान घाटी में चीनियों को गला तोड़ जवाब भी दे कर अपने इरादे बता दिए है.

भारत की जनता का आक्रोश
भारत की जनता चाहे जैसी भी हो उसे 2 बातें कतई बर्दास्त नहीं 1) क्रिकेट में हार और दूसरा अपने देश पर वार और बात जब देश और सेना की हो तो भारत की जनता बहुत भावुक हो जाती है. चीन अपने बारे में सकारात्मक बातें और अपने ताकत के झूठे प्रचार के लिए 10B डॉलर यानि लगभग 7500 करोड़ रुपये खर्चील करता है और इसका एक बड़ा हिस्सा भारत में भी आता है. पर भारत की जनता उस छलावे में ना आकर देश की सेना के साथ कड़ी दिखी और बॉयकॉट चीन की मुहीम पुरे देश में देखने को मिला. यह मुहीम सिर्फ सड़क पर ही नहीं दिखा बल्कि इसका चीनी सामानों के आयात पर भी इसका असर देखने को मिला. चीन को भारी नुकसान उठाना पड़ा. चीन की सबसे बड़ी  ताक़त को भारत के लोगो ने तोड़ दिया.

भारत की कूटनीति
प्रधानमंत्री मोदी के बार बार विदेशी दौरे पर सवाल उठाने वाले आज चुप हो गए होंगे. भारत ने अंतर्राष्टीय मंच पर चीन को अलग थलग करने में सफलता पाई है. कोरोना वायरस फ़ैलाने के आरोपों से घिरे चीन ने यह हरकत किया ही इसी वजह से था जिससे उसके देश के लोगो और विश्व का ध्यान भटका सके. पर चीन पर भड़के देश भारत के साथ खड़े दिखे. मैंने अगर भारत चीन युद्ध हुआ तो में इस से पहले भी लिखा था कि "In International Politics, There is no Permanent Enemies or Permanent Friends, but Permanent Interest". आज भारत का साथ देना अमेरिका ऑस्ट्रिया जैसे देशो का स्वार्थ हो सकता है पर फ़िलहाल वो ज्यादा अहमियत नहीं रखता. इजराइल भारत का मित्र है ही. इजराइल हमेशा और हर तरह से भारत की मदद करने को हमेशा तैयार बैठा है. ऊपर से नरेंद्र मोदी ने इजराइल की यात्रा कर, जो भारत देश के किसी भी प्रधानमंत्री द्वारा प्रथम यात्रा थी, उसे और भी मजबूत बना दिया है.
 
जापान चीन सीमा विवाद
जापान और चीन के बीच सीमा विवाद इन दोनों देशो के इतिहास जितना पुराना है. सेंकाकोस द्वीप पर जापान और चीन दोनों देश अपना अपना दावा प्रस्तुत करते रहे है.
South China Morning Post
जापान 1971 से अपना दावा प्रस्तुत कर रहा है और चीन हमेशा की तरह सदियों पहले हमारे राज्य में था तो आज भी हमारा इस पर हक़ होना चाहिए की रट लगा रहा है. यही कह कर चीन ने तिब्बत मंगोलिया ताइवान हांगकांग अक्साई चीन सिक्किम भूटान अरुणाचल प्रदेश पर अपना आधिकार जताता रहा है. गलवान घाटी में भारत चीन के बीच हुए तनाव का फायदा उठा कर जापान ने बड़े समझदारी और चालाकी से सेंकाकोस द्वीप पर अपना दावा मजबूत कर लिया. चीन ने जापान को परिणाम भुगतने की धमकी दिया तो अमेरिका में 1960 में जापान के साथ अपने समझौते का हवाला देते हुए जापान की रक्षा करनेकी बाध्यता दिखाया. चीन अभी 2 मोर्चो पर युद्ध के लिए तैयार नहीं है.

रूस का भारत के प्रति झुकाव
1962 में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच चल रहे क्यूबा मिसाइल संकट की वजह से अमेरिका या सोवियत संघ कोई भी भारत का साथ नहीं दे पाया था. क्यूबा मिसाइल संकट ख़त्म होते ही रूस अपने पुराने रंग में वापस आ गया, पर भारत के किसी प्रधानमंत्री ने कभी अक्साई चीन को वापस लेने की कभी इच्छा शक्ति दिखाया ही नहीं. पर इस बार की सरकार ने पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर जैसी आक्रामकता दिखाया है कल अक्साई चीन ओर बभी दिखा सकती है और इस पर रूस भी मजबूर नहीं है. ऐसे में UN में भारत के स्थायी सदस्यता (वही जो भारत को 1960 में ही देने के लिए कहा गया था, पर नेहरू ने चीन को दिलवा दिया) के पक्ष में बात कह कर रूस ने चीन को थोड़ा चिंतित कर दिया है. उसके अलावा भारत ने रूस से मिग 29 और SU-30Mki लड़ाकू विमान के अलावा S 400 की जल्द से जल्द भारत लाने की बात करने भारत देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मॉस्को गए हुए है. इन्ही सब वजह से चीन चिंतित है.

यह कुछ मुख्य कारण है जिस वजह से चीन पीछे हटाने की तैयार तो हुआ है पर चीन की कथनी और करनी में बहुत अंतर है. इसके अलावा पेंगॉन्ग त्सो झील का मुद्दा भी बाधा बन रहा है. भारतीय सेना हर तरह के स्थिति में निपटने के लिए तैयार तो है पर भारत को अपने विदेशनीति में बदलाव की जरुरत है. अन्यथा 10 से ज्यादा पडोशी होते हुए भी चीन भारत पर ही अपनी आक्रामकता दिखाने क्यों आया? नेपाल जो भारत के सहारे ही चल रहा है वह भारत को आंखे क्यों दिखा रहा है? यह भारत की वर्षो से चली आ रही रक्षात्मक और नरम विदेशनीति का परिणाम है. मोदी सरकार को इसे बदलने की जरुरत है.

जय हिन्द
वन्देमातरम



यह भी पढ़ें

Comments

Popular posts from this blog

राजा पुरु और सिकंदर का युद्ध

भारत प्राचीन काल से ही अति समृद्ध देश रहा है. इसके साक्ष्य इतिहास में मिलते है. इसी वजह से भारत को सोने की चिड़ियाँ कहा जाता था. यह भारत की समृद्धि ही थी, जिसके वजह से विदेशी हमेशा से ही भारत की तरफ आकर्षित हुए है और भारत पर आक्रमण कर भारत को विजयी करने की कोशिश करते आए है. भारत पर आक्रमण करने वालों में सिकंदर (Alexander), हूण, तुर्क, मंगोल, मुगल, डच, पुर्तगाली, फ्रांसिसी और ब्रिटिश प्रमुख है. आज से हम भारत पर हुए सभी विदेशी आक्रमणों की चर्चा करेंगे. साथ ही साथ हम ऐसे महान राजा, महाराजा और वीरांगनाओं पर भी चर्चा करेंगे, जिन्होंने इन विदेशी आक्रांताओ के विरुद्ध या तो बहादुरी से युद्ध किया या फिर उन्हें पराजित कर वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. यह केवल एक इसी लेख में लिख पाना संभव नहीं है. वजह से इसके मैं कई भागों में लिखूँगा. इस कड़ी के पहले भाग में हम बात करेंगे सिकंदर की, जिसे यूरोपीय और कुछ हमारे इतिहासकार महान की उपाधि देते है. हम इस बात पर भी चर्चा करेंगे कि क्या सिकंदर वास्तव में इतना महान था या फिर यूरोपीय इतिहासकारों ने सिकंदर के बारे में कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर लिखा है? इसमें हम बह...

भारत और वैदिक धर्म के रक्षक पुष्यमित्र शुंग

विदेशी आक्रांताओं के प्रथम कड़ी में हमने सिकंदर के भारत पर आक्रमण और राजा पुरु के साथ युद्ध के विषय में चर्चा किया था. विदेशी आक्रांताओं की द्वितीय कड़ी में हम ऐसे एक महान राजा के विषय में चर्चा करेंगे, जिसे एक षड़यंत्र कर इतिहास के पन्नों से मिटाने के लिए हर संभव प्रयत्न किया गया. कभी उसे बौद्ध धर्म का कट्टर विरोधी और बौद्ध भिक्षुकों का संहारक कहा गया, कभी उसे कट्टर वैदिक शासन को पुनः स्थापित करने वाला कहा गया. किन्तु वामपंथी इतिहासकारों ने कभी उस महान राजा को उचित का श्रेय दिया ही नहीं. क्योंकि वह एक ब्राम्हण राजा था. यही कारण है कि आज वह राजा, जिसे "भारत का रक्षक" का उपनाम दिया जाना चाहिए था, भारत के इतिहास के पन्नों से विलुप्त कर दिया गया है. हम बात कर रहे है पुष्यमित्र शुंग की, जिन्होंने भारत की रक्षा यवन (Indo Greek) आक्रमण से किया. सिकंदर (Alexander) के आक्रमण के बाद का भारत (मगध साम्राज्य) सिकंदर के भारत पर आक्रमण और राजा पुरु के साथ युद्ध के बाद आचार्य चाणक्य ने नंदवंश के अंतिम राजा धनानंद को राजगद्दी से पद्चुस्त कर चन्द्रगुप्त को मगध का राजा बनाया. यहीं से मगध में मौर्...

छत्रपति शिवजी महाराज राजे

आज छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती है. आज ही के दिन उनका जन्म 1630 में हुआ था. शिवाजी महाराज एक कुशल शासक, योग्य सेनापति, राजनीति और कूटनीति में निपुण, गोरिल्ला लड़ाई में धुरंधर थे. शिवाजी महाराज भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे. शिवाजी महाराज ने मुगल आक्रान्ताओं से लोहा लिया और उनके विरुद्ध जाकर, युद्ध कर और उन्हें हरा कर अपना एक अलग साम्राज्य बनाया. शिवाजी महाराज ने स्वराज का सपना देखा और हिन्दू साम्राज्य का प्रतिक भगवे को अपना कर सम्पूर्ण भारत वर्ष की भूमि को भगवामय करने का सपना देखा, जिसे उन्होंने काफी हद तक पूरा भी किया. किन्तु शिवाजी राजे का केवल इतना ही परिचय है? क्या युद्ध, कूटनीति, भगवा, स्वराज से अलग शिवाजी राजे का कोई और व्यक्तित्व नहीं है? हम आज की चर्चा शिवाजी राजे के कुछ ऐसी बातों पर करेंगे, जिससे शायद बहुत ही कम लोग परिचित है. अगर परिचित भी है, तो वो उस पर बात नहीं करते. मातृभक्त शिवाजी राजे की माता का नाम जीजाबाई था. राजे का पालन पोषण उनकी माता श्री ने अकेले ही किया था. साथ ही साथ राजे की पहली गुरु भी वही बनी. जिजाऊ साहेब राजे को बचपन से ही भगवान राम, कृष्णा महा...

कश्मीर की चुड़ैल और लंगड़ी रानी "दिद्दा"

भारत वर्ष का इतिहास विश्व के प्राचीनतम इतिहासों में से एक है. कल तक जो भारत के इतिहास को केवल 3000 वर्ष प्राचीन ही मानते थे, वो हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति के अवशेष मिलने के बाद अब इसे प्राचीनतम मानाने लगे है. पुरातत्व विभाग को अब उत्तर प्रदेश के सिनौली में मिले नए अवशेषों से यह सिद्ध होता है कि मोहनजोदड़ो के समान्तर में एक और सभ्यता भी उस समय अस्तित्व में था. यह सभ्यता योद्धाओं का था क्योंकि अवशेषों में ऐसे अवशेष मिले है, जो योद्धाओं के द्वारा ही उपयोग किया जाता था, जैसे तलवार रथ. इस खोज की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ पर ऐसे भी अवशेष मिले है, जो नारी योद्धाओं के है. इस से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस संस्कृति में नारी योद्धा भी रही होंगी. भारतीय संस्कृति और इतिहास में नारियों का विशेष स्थान रहा है. परन्तु हम आज झाँसी की रानी, रानी दुर्गावती और रानी अवन्तिबाई तक ही सिमित रह गए है. इनके अलावा और भी कई और महान योद्धा स्त्रियाँ हुई है भारत के इतिहास में. जैसे रानी अब्बक्का चौटा और कश्मीर की चुड़ैल रानी और लंगड़ी रानी के नाम से विख्यात रानी दिद्दा. आज हम कश्मीर की रानी दिद्दा के बारे म...

जैन: भारत के असली अल्पसंख्यकों में से एक

भारत की सभ्यता प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है. यहाँ सनातन धर्म के साथ साथ जैन धर्म बौद्ध धर्म को मानाने वाले लोग शांति और समभाव से सदियों से रहते आ रहे है. भारत के कोने कोने में सनातन धर्म के मंदिरो के साथ साथ बौद्ध मठों और जैन तीर्थ स्थानों का भी अपना इतिहास रहा है. किन्तु तलवार के दम पर एक धर्म का फैलाव इस तरह हुआ कि आज अपने ही देश में यह प्राचीन धर्म एक अल्पसंख्यक बन कर रह गए है. ज्यादा संख्या न होने की वजह से किसी के वोट बैंक को ज्यादा फायदा नहीं पंहुचा सकते, इसी वजह से यह अल्पसंख्यक हमेशा से ही उपेक्षित रहा है. हद तो तब हो गई, जब राज्य सरकारों के द्वारा इन देरासरों की उचित सुरक्षा और रख रखाव का आभाव देखा गया. आज की चर्चा हम इसी उपेक्षित जैन समाज पर करेंगें. जैन धर्म का इतिहास इस धर्म का इतिहास सनातन धर्म के समानांतर चला आ रहा है. जैन धर्म में मानाने वाले अपनी भगवान को तीर्थकर कहते है. इस प्रकार जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव है, जो इस धर्म के संस्थापक माने जाते है. ऋषभदेव को "आदिदेव" या "आदिश्वरा" भी कह कर संबोधित किया जाता है, जिसका अर्थ होता है प्रथम ईश्वर...